आज अकेला
सुनी संध्या में
उदास मन को बहलानेसुनी संध्या में
खोल बैठा तुम्हारी अलमारी
अचानक शादी की
पचासवीं वर्ष-गाँठ पर पहनी
तुम्हारी साड़ी
मेरे हाथ में आ गयी
साड़ी को छुआ
तो यूं लगा जैसे तुम उसके
रोम-रोम में समाई हुई हो
तुम्हारी देह की
संदिल गंध समा गई
मेरे पोर-पोर में
यूं लगा जैसे अचानक
कहीं से आकर तुमने मुझे
बाँहों में भर लिया हो
मैं अपलक निहारता रहा
तुम्हारी साड़ी को
तुम्हारी कंचन काया की छवि
छाने लगी मेरी आँखों में
मन में तिरने लगी तस्वीरें
उस रंग भरी शाम की
सधन हो गया प्रेम
आँखों से बहने लगे आँसूं
सारी उदासी बह गई
रह गया केवल तुम्हारा मेरा प्रेम।
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