सरसों झूम रही है खेतों में
आम्र मंजरी महक उठी है बागों में
अनुरागी भंवरा ढूंढ़ रहा कलियों को
कोयलियां कुक रही है कुंजों में
मुस्करा कर ऋतुराज
भर रहा बसंत को बाहों में
रंग-बिरंगे फूल खिले हैं
बाग़ और बगीचों में
बाग़ और बगीचों में
बसंती चादर ओढ़
सरसों झूम उठी खेतों में
सरसों झूम उठी खेतों में
लताऐं कर रही आलिंगन पेड़ों का
गौरैया फुदक रही है आँगन में
लौट आओ तुम भी
मदमाते बसंत की राहों में
आकर एक बार फिर से
आकर एक बार फिर से
समा जाओ मेरी बाहों में।
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