Thursday, 24 November 2016

मीठी स्मृतियाँ

एक धरोहर के रूप में
अंतहीन यादें हैं तुम्हारी
मेरे पास  

तुम्हारे जाने के बाद भी 
वो छाई हुई है
मेरे अंतश मन के पास 

समुद्र के किनारे सीपियां चुनना 
गंगा के घाट पर दीपक तैराना 

पार्क में कोयल की कुहू-कुहू सुनना 
पीपल की छांव में मोर का नाच देखना 

गांव के खेतों में मीठे बैर तोड़ना
घूँघट की आड़ में
तिरछी नज़र से झांकना

होली पर एक दूजे को रंग लगाना
दीवाली में संग-संग दीपक जलाना

गर्मी की रातों में छत पर सोना
दबे पांव आकर आँखें बंद करना

  न जाने कितनी यादें हैं 
कहाँ से शुरू करूँ
और कहाँ अंत करूँ

रिमझिम फुहारों सी है
तुम्हारी यादें
जब भी मुझे छूती है
जेठ में भी खिलखिला के
सावन हँसने लगता है। 





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