एक धरोहर के रूप में
अंतहीन यादें हैं तुम्हारी
मेरे पास
तुम्हारे जाने के बाद भी
वो छाई हुई है
मेरे अंतश मन के पास
समुद्र के किनारे सीपियां चुनना
गंगा के घाट पर दीपक तैराना
पार्क में कोयल की कुहू-कुहू सुनना
पीपल की छांव में मोर का नाच देखना
गांव के खेतों में मीठे बैर तोड़ना
घूँघट की आड़ में
तिरछी नज़र से झांकना
तिरछी नज़र से झांकना
होली पर एक दूजे को रंग लगाना
दीवाली में संग-संग दीपक जलाना
गर्मी की रातों में छत पर सोना
दबे पांव आकर आँखें बंद करना
न जाने कितनी यादें हैं
कहाँ से शुरू करूँ
और कहाँ अंत करूँ
रिमझिम फुहारों सी है
तुम्हारी यादें
जब भी मुझे छूती है
जेठ में भी खिलखिला के
सावन हँसने लगता है।
रिमझिम फुहारों सी है
तुम्हारी यादें
जब भी मुझे छूती है
जेठ में भी खिलखिला के
सावन हँसने लगता है।
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