विरह की अगन में दहक रही है जिंदगी
कंपित लौ सा धुँआ दे रही अब जिंदगी।
विरह के दुःखों के दर्द से भरी है जिंदगी
अधरों की मुस्कान खो चली अब जिंदगी।
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कंपित लौ सा धुँआ दे रही अब जिंदगी।
विरह के आघात को सह रही है जिंदगी
रातों के नेह स्पर्श से दूर है अब जिंदगी।
अधरों की मुस्कान खो चली अब जिंदगी।
विरह के दुःखों से फ़साना बनी जिंदगी
टूटी हुई पतवार लगती है अब जिंदगी।
विरह के दर्दों को जिए जा रही जिंदगी
ग़मों के दर्द को पिए जा रही है जिंदगी।
ग़मों के दर्द को पिए जा रही है जिंदगी।
विरह के दुःखों में घुल रही अब जिंदगी
बिन पानी मीन सी तड़फ रही है जिंदगी।
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