आज पंद्रह महीने बीत गए,तुमसे बिछुड़े हुए
आँखें बिछी है राह में, हो सके तो लौट आओ।
प्रीत के पहले प्रहर में ही तुम तो बिछुड़ गई
बिछुड़ गयी तुम,यादों का सिलसिला दे कर
बेक़रार है यह दिल, हो सके तो लौट आओ।
कोलकाता
६ अक्टुम्बर, २०१५
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आँखें बिछी है राह में, हो सके तो लौट आओ।
प्रीत के पहले प्रहर में ही तुम तो बिछुड़ गई
मिट गए संजोये ख्वाब,हो सके तो लौट आओ।
बिछुड़ गयी तुम,यादों का सिलसिला दे कर
बेक़रार है यह दिल, हो सके तो लौट आओ।
तुम्हें ही सोचता, लिखता,गुनगुनाता रहता हूँ
पुकारता रहता है मन, हो सके तो लौट आओ।
अश्रु ढुलकते रहते,तकिया भीगता रहता है,
जीवन के ढलान पर,हो सके तो लौट आओ।
दिन यादों में और रात रोने में कट जाती है
खोया रहता है मन, हो सके तो लौट आओ।
कोलकाता
६ अक्टुम्बर, २०१५
page sankhya ----- २१
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