सुनी यादों के जंगल में, खाली मेरा जीवन है
गीत अधूरे रह गए मेरे, तुम जो बिछुड़ गई।
मंजिलें अब जुदा हो गई, अंजानी अब राहें हैं जिंदगी अब दर्द बन गई, तुम जो बिछुड़ गई।
खाली-खली मन रहता,एक उदासी गहरी छाई
यादें अब तड़पाती मुझको, तुम जो बिछुड़ गई।
साथ जियेंगे साथ मरेगें, हमने कसमें खाई थी
जीवन ही वीरान हो गया,तुम जो बिछुड़ गई।
सपने मेरे सपने रह गए,ऑंखें हैं अब भरी-भरी
टूट पड़ा है पहाड़ दुःखों का,तुम जो बिछुड़ गई।
अब न कोई संगी-साथी, राहों में जो साथ चले
जीवन-पथ में रहा अकेला, तुम जो बिछुड़ गई।
किससे मन की बात करूँ,संग तुम्हारा रहा नहीं
कैसे अब दिल को बहलाऊँ, तुम जो बिछुड़ गई।
page sankhya ----- 42
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