Saturday, 19 November 2016

आज भी तुम्हे पुकारती है

वो गीता
जिसे तुम रोज पढ़ा करती थी
अपने ममता भरे स्वर में
आज भी तुम्हे पुकारती है

वो धौली
जिसे तुम रोज सुबह
अपने हाथ से रोटी खिलाती थी
आज भी दरवाजे पर रंभाती है

वो पंछी
जिन्हें तुम रोज
दान-पानी दिया करती थी
आज भी छत पर चहचहाते हैं

वो तुलसी
जहाँ तुम रोज घी का
दीपक जलाया करती थी
आज भी तुम्हारी राह टेरती है

वो बिंदिया
जिसे तुम रोज दर्पण के 
किनारे लगाया करती थी 
आज भी तुम्हारी राह देखती है

वो दरवाजा
जहाँ तुम शाम को बैठती थी
आज भी तरसती आँखों से
तुम्हारी राह देखता है 

वो लाडली 
पोती आयशा जिसे तुम 
रोज गोद खिलाया करती थी
आज भी तुम्हें ढूंढती है।



पेज संख्या ----१३ 

No comments:

Post a Comment