मेरे आस-पास
भर कर पानी
पिछले तीन दिनों से
नहीं निकल रहा सूरज
भीगी हवाएं जब भी
तन से टकराती है
तुम्हारी कोमल छुअन की
मीठी यादें ताजा कर जाती है
गीली आँखों में
उमड़ पड़ते हैं यादों के बादल
मेरे आँखों के बादल से
तुम भी कहीं भीगती होगी
मेरा भीगा-भीगा मन
याद करता है तुम्हें
एक डोर है हम दोनों के बिच
जो टूटती नहीं
एक आस है जो छुटती नहीं।
पेज संख्या ३१
भीगी-भीगी है सुबह-शाम
बादल आज भी आए हैंभर कर पानी
पिछले तीन दिनों से
नहीं निकल रहा सूरज
खिड़की पर हल्की धूप
कभी-कभार
टपक पड़ती है भूल से
टपक पड़ती है भूल से
शहर तो वैसा ही है
पहले की तरह
सड़के और गलियाँ
बन गई है ताल-तलैया
बन गई है ताल-तलैया
गाड़ियाँ रेंग रही है सड़को पर
भीगी हवाएं जब भी
तन से टकराती है
तुम्हारी कोमल छुअन की
मीठी यादें ताजा कर जाती है
गीली आँखों में
उमड़ पड़ते हैं यादों के बादल
मेरे आँखों के बादल से
तुम भी कहीं भीगती होगी
मेरा भीगा-भीगा मन
याद करता है तुम्हें
एक डोर है हम दोनों के बिच
जो टूटती नहीं
एक आस है जो छुटती नहीं।
पेज संख्या ३१
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