Showing posts with label मेरे संग-संग. Show all posts
Showing posts with label मेरे संग-संग. Show all posts

Monday, 28 November 2016

मेरे संग-संग

आज बहती पुरबा ने 
हौले से मेरे कान में कहा
पागल आँखें क्यों रो रही है ?

याद कर
संग-सफर की बातें
बेहद मीठी होती है यादें

मैं जैसे ही
तुम्हारी यादों में डूबा
तुम बरखा बन
चली आई मेरे पास

तुम्हारी यादों की
रिमझिम फुहारों ने
भीगा दिया मेरा तन-मन

मैं भूल गया तन्हाई
डूब गया तुम्हारी यादों
समंदर में

कल तुम फिर से आना
बन कर सूरज की
पहली किरण

मुझे हौले से सहलाना
कुछ देर बैठ जाना मेरे
सिरहाने के पास

मैं जब-जब तुम्हें याद करूँ
तुम इसी तरह परछांई बन
चलती रहना मेरे संग-संग।


page sankhya ----54