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Sunday, 18 December 2016

अब वह बात कहाँ ?

अब वह बात कहाँ 


पहले थी मोहब्बते जिंदगी
अब वह बात कहाँ ?

सुबह-शाम घूमने जाते
हँस-हँस करके बातें करते
तोड़ फूल हाथों में देते
अब वह बात कहाँ ?

एक दूजे की राह देखते 
साथ बैठ कर खाना खाते
मनुहारों से भोजन करते 
अब वह स्वाद कहाँ ?

शाम-सवेरे पूजा करते
भजन-आरती संग में गाते 
रागों की झंकार उठाते
अब वह समा कहाँ ?

जब भी हम फुर्सत में होते 
साथ बैठ कर खेल खेलते 
पुनर्मिलन की इस जीवन में
अब वह घड़ी कहाँ ?


देश-विदेश घूमने जाते
एक दूजे के संग में चलते 
चाँद-चांदनी संग था अपना 
अब वह साथ कहाँ ?  

पहले थी मोहब्बते जिंदगी
अब वह बात कहाँ ?




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