Saturday, 3 December 2016

जीवन की परिभाषा

आँख का खुलना
और बंद होना
इतने में ही तो सिमट जाता
है जीवन

साँस का आना 
और दूसरी का जाना
इतने में ही तो गुजर जाता
है जीवन

बिजली का चमकना
और लुप्त होना
इतने में ही तो बीत जाता
है जीवन

गर्म तवे पर
पानी की बून्द का 
गिरना और मिटना
इतने में ही तो मिट जाता
है जीवन

जलते दीपक का
हवा के झोंकें से बुझना
इतने में ही तो लुट जाता
है जीवन

बंद मुट्ठी से
रेत का फिसलना
इतने में ही तो रीत जाता
है जीवन।

सागर की लहरों का
किनारे से टकराना और लौटना
इतने में ही तो लौट जाता
है जीवन।



पेज संख्या -----73 

No comments:

Post a Comment