Saturday, 19 November 2016

तुम मेरी हो मेरी ही रहोगी

तुम्हारे महाप्रयाण को देख
आँखों से अश्रुओं की
सरिता बहने लगी

साँसें अंदर से
लम्बी और गहरी
निकलने लगी

मैं तुम्हारे मुखमंडल को
दोनों हाथों से सहलाने लगा
काश! तुम कुछ बोलो

अपनी अंतिम बेला में
दो शब्द कहने के लिए
अपना मुँह खोलो

लेकिन तुम तो
अलविदा की बेला में भी
निस्पृह थी

गर्व से ऊँचा मस्तक
शान्ती से मुंदी आँखें
त्याग की प्रतिमूर्ति
लग रही थी

लेकिन सुकून है
मेरे दिल को कि एक दिन
तुम मुझे फिर मिलोगी

उस पराजगत में ही सही
लेकिन तुम मुझे मिलोगी
तुम तो युगों-युगों से मेरी हो
और मेरी ही रहोगी।



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