Sunday, 20 November 2016

काश ! तुम मेरे साथ रहती

आज-कल मुझे
किसी के फ़ोन का
इन्तजार नहीं रहता

जब तक तुम्हारा साथ था
मुझे इन्तजार रहता
तुम्हारे फोन का

दिन में आ जाते
पांच -सात फ़ोन तुम्हारे
दो-चार मैं भी कर लेता

लेकिन अब मैं किसके
फ़ोन का इन्तजार करू 
और किसे मैं करूँ ?

दिन में कभी-कभी 
भूल से खोल लेता हूँ 
टेबल की दराज को 

यह देखने के लिए 
कि तुम्हारा कोई 
फ़ोन तो नहीं आया 

अचानक दूसरे ही पल 
ख़याल आता है 
अरे ! तुम्हारा फ़ोन तो 
अब कभी नहीं आएगा 

अनमना हो 
देखने लगता हूँ 
फ़ोन पर लगी 
तुम्हारी तस्वीर को

सोचता हूँ काश ! 
हम दोना का साथ 
हमेशा बना रहता

जैसे सीप और मोती 
सूरज और प्रकाश 
दीपक और बाती 

तब हमारा जीवन भी 
कुछ खास होता 
काश ! ऐसा ही कुछ होता।  



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