आज-कल मुझे
किसी के फ़ोन का
इन्तजार नहीं रहता
जब तक तुम्हारा साथ था
मुझे इन्तजार रहता
तुम्हारे फोन का
दिन में आ जाते
पांच -सात फ़ोन तुम्हारे
दो-चार मैं भी कर लेता
लेकिन अब मैं किसके
फ़ोन का इन्तजार करू
और किसे मैं करूँ ?
दिन में कभी-कभी
भूल से खोल लेता हूँ
टेबल की दराज को
यह देखने के लिए
कि तुम्हारा कोई
फ़ोन तो नहीं आया
अचानक दूसरे ही पल
ख़याल आता है
अरे ! तुम्हारा फ़ोन तो
अब कभी नहीं आएगा
अनमना हो
देखने लगता हूँ
फ़ोन पर लगी
तुम्हारी तस्वीर को
सोचता हूँ काश !
हम दोना का साथ
हमेशा बना रहता
जैसे सीप और मोती
सूरज और प्रकाश
दीपक और बाती
तब हमारा जीवन भी
कुछ खास होता
काश ! ऐसा ही कुछ होता।
पेज संख्या -----४०
किसी के फ़ोन का
इन्तजार नहीं रहता
जब तक तुम्हारा साथ था
मुझे इन्तजार रहता
तुम्हारे फोन का
दिन में आ जाते
पांच -सात फ़ोन तुम्हारे
दो-चार मैं भी कर लेता
लेकिन अब मैं किसके
फ़ोन का इन्तजार करू
और किसे मैं करूँ ?
दिन में कभी-कभी
भूल से खोल लेता हूँ
टेबल की दराज को
यह देखने के लिए
कि तुम्हारा कोई
फ़ोन तो नहीं आया
अचानक दूसरे ही पल
ख़याल आता है
अरे ! तुम्हारा फ़ोन तो
अब कभी नहीं आएगा
अनमना हो
देखने लगता हूँ
फ़ोन पर लगी
तुम्हारी तस्वीर को
सोचता हूँ काश !
हम दोना का साथ
हमेशा बना रहता
जैसे सीप और मोती
सूरज और प्रकाश
दीपक और बाती
तब हमारा जीवन भी
कुछ खास होता
काश ! ऐसा ही कुछ होता।
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