तुम मुझे
जीवन के राहे-सफर में
अकेला छोड़ कर चली गई
जीवन के राहे-सफर में
अकेला छोड़ कर चली गई
तुमने यह भी नहीं सोचा कि
कल सुबह कौन पिलाएगा मुझे
अदरक वाली चाय
कौन बनाएगा मेरे लिए
केर-सांगरी का साग और
मीठी आंच पर रोटी
कौन खिलायेगा मुझे
दुपहर में चाय के साथ
मीठी-मीठी केक
कौन घुमायेगा अपनी
नरम-नरम अँगुलियों को
मेरे बालो में
कौन घुमायेगा अपनी
नरम-नरम अँगुलियों को
मेरे बालो में
जब तुम नहीं रहोगी
तब किसके साथ करूँगा
अपने मन की बात
अपने मन की बात
कैसे पूरी कर पाऊंगा
अपने जीवन की अधूरी
कविता को
कविता को
कौन बताएगा आज मुझे
कि प्रेम की परिणति दुःख है
या दुःख की पराकाष्ठा प्रेम है।
कि प्रेम की परिणति दुःख है
या दुःख की पराकाष्ठा प्रेम है।
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